नई दिल्ली: नई दिल्ली स्थित इंडिया हैबिटेट सेंटर में आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में देश की सबसे बड़ी किसान-संचालित पारिस्थितिक पहल ‘कावेरी कॉलिंग’ अभियान की अभूतपूर्व उपलब्धियों पर विस्तृत चर्चा की गई। ईशा फाउंडेशन द्वारा संचालित इस परियोजना के जरिए कर्नाटक और तमिलनाडु के किसानों के निजी खेतों में बड़ा कृषि परिवर्तन देखा जा रहा है। इस अवसर पर तमिलनाडु के सफल किसान वल्लुवन और अभियान के प्रोजेक्ट डायरेक्टर आनंद एथिराजालु ने बताया कि वृक्ष-आधारित खेती न केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रही है, बल्कि मिट्टी, पानी और पर्यावरण के संरक्षण में भी मील का पत्थर साबित हो रही है।
तमिलनाडु के कुड्डालोर के रहने वाले किसान वल्लुवन ने साझा किया कि पहले वे अपने खेत में केवल नारियल की एकल खेती करते थे, जिससे उन्हें लगातार आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा था। इसके बाद वे कावेरी कॉलिंग अभियान से जुड़े और पारंपरिक ढर्रे को बदलकर पेड़ आधारित और बहुफसली खेती को अपनाया। वल्लुवन ने अपने खेत को एक ‘फूड फॉरेस्ट’ के रूप में बदल दिया, जहाँ नारियल के साथ काली मिर्च, फलदार वृक्ष और इमारती लकड़ियों के पेड़ एक साथ लगाए गए हैं। इस मॉडल से उनकी आय पहले की तुलना में करीब छह गुना बढ़ गई है और खेती का जोखिम खत्म हो गया है। इस उत्कृष्ट कार्य के लिए उन्हें संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) द्वारा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित भी किया जा चुका है। खेत में कम जुताई, मल्चिंग और कवर क्रॉपिंग जैसी प्राकृतिक तकनीकों के उपयोग से खेती की लागत में भारी कमी आई है और मिट्टी में जैविक कार्बन की मात्रा बढ़ी है, जिससे सूखा पड़ने पर भी नमी बनी रहती है और भारी बारिश में मिट्टी का कटाव रुक जाता है।
अभियान के प्रोजेक्ट डायरेक्टर आनंद एथिराजालु ने बताया कि ‘कावेरी कॉलिंग’ के तहत अब तक 13.4 करोड़ पेड़ लगाए जा चुके हैं और लगभग 2.6 लाख किसानों को वृक्ष आधारित खेती अपनाने में प्रत्यक्ष सहायता प्रदान की गई है। इस मांग को पूरा करने के लिए तमिलनाडु में ईशा नर्सरी स्थापित की गई है, जो सालाना 85 लाख पौधे उत्पादन क्षमता और 54 विभिन्न प्रजातियों की विविधता के साथ दुनिया की सबसे बड़ी सिंगल-साइट नर्सरियों में से एक है, जिसका प्रबंधन मुख्य रूप से ग्रामीण महिलाओं द्वारा किया जाता है। कर्नाटक सरकार ने भी ईशा आउटरीच के साथ एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं ताकि कावेरी नदी के जल प्रवाह को पुनर्जीवित किया जा सके। डायरेक्टर ने स्पष्ट किया कि फिलहाल उत्तर भारत में ऐसी कोई योजना शुरू करने की तैयारी नहीं है, लेकिन दक्षिण भारत में यह मॉडल ग्रामीण आजीविका के लिए एक बड़ी क्रांति बन चुका है।

