नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (पॉक्सो) के कथित दुरुपयोग पर गंभीर चिंता जताई। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार से कहा कि कानून में ‘रोमियो-जूलियट’ नियम जोड़े जाएं, ताकि वास्तविक किशोर प्रेम संबंधों को इसके कड़े प्रावधानों से बाहर रखा जा सके। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पॉक्सो मामलों में जमानत के दौरान हाईकोर्ट पीड़ित की उम्र का अनिवार्य मेडिकल परीक्षण कराने का आदेश नहीं दे सकता।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटेश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि पॉक्सो कानून के दुरुपयोग को लेकर कई बार न्यायिक संज्ञान लिया गया है। इस फैसले की एक प्रति भारत सरकार के विधि सचिव को भेजी जाएगी, ताकि इस समस्या से निपटने के लिए आवश्यक कदमों पर विचार किया जा सके। पीठ ने सुझाव दिया कि किशोर प्रेम संबंधों को कानून के दायरे से बाहर रखने के लिए ‘रोमियो-जूलियट’ नियम जोड़े जाएं और ऐसे मामलों में कार्रवाई की जाए, जहां कानून का इस्तेमाल निजी बदले या हिसाब-किताब चुकता करने के लिए किया जाता है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने पॉक्सो कानून को “न्याय की सबसे पवित्र अभिव्यक्तियों में से एक” बताया, जिसका उद्देश्य बच्चों की सुरक्षा करना है। अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक आदेश को रद्द करते हुए कहा कि जमानत सुनवाई के दौरान पीड़ित की उम्र का मेडिकल परीक्षण कराने का निर्देश देना दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 439 के तहत हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र से बाहर है। पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट अपनी जमानत संबंधी शक्तियों का उपयोग करते हुए “मिनी ट्रायल” नहीं चला सकते और न ही ऐसे अनिवार्य जांच निर्देश दे सकते हैं, जो मौजूदा कानूनों के विपरीत हों।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों से जुड़े मामलों में जमानत मिलने के बाद सबूतों से छेड़छाड़ या गवाहों को प्रभावित किए जाने की आशंका एक गंभीर और वास्तविक चिंता है। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने यह टिप्पणी उत्तर प्रदेश के शामली के एक युवक को दी गई जमानत रद्द करते हुए की। युवक पर आरोप है कि उसने हथियार के बल पर एक नाबालिग से कई बार दुष्कर्म किया और ब्लैकमेल करने के लिए घटना का वीडियो भी रिकॉर्ड किया।
कोर्ट ने कहा कि पीड़ित की सुरक्षा और न्याय प्रक्रिया की शुचिता बनाए रखना सर्वोपरि है। जमानत याचिका पर विचार करते समय अदालत का कर्तव्य है कि वह अपराध की प्रकृति, उसकी गंभीरता और जांच के दौरान एकत्र किए गए सबूतों को ध्यान में रखे। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जमानत न तो तकनीकी आधार पर खारिज की जानी चाहिए और न ही महत्वपूर्ण साक्ष्यों की अनदेखी करके दी जानी चाहिए।
